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खाकी की दबंगई या रेत माफियाओं का संरक्षण? जनदर्शन में गुहार, पुलिस पर साक्ष्य मिटाने और मोबाइल हड़पने का गंभीर अपराध

न्याय के रक्षक ही बने भक्षक! कानून-व्यवस्था से आम जनता का उठा भरोसा

 

 

 

 

एमसीबी (मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर): जिले के केल्हारी थाना अंतर्गत ग्राम बिछियाटोला में अवैध रेत उत्खनन का काला कारोबार अब एक ऐसे मोड़ पर आ गया है, जहाँ पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवालिया निशान लग गए हैं। न्याय की उम्मीद में थाने की चौखट तक जाने वाला पीड़ित अब खुद को ठगा और असुरक्षित महसूस कर रहा है। आरोप है कि रेत माफियाओं के खिलाफ आवाज उठाना एक युवक को भारी पड़ गया, जहाँ न सिर्फ उसके साथ मारपीट की गई, बल्कि रक्षकों की भूमिका निभाने वाली पुलिस पर ही सबूत मिटाने और निजी मोबाइल हड़पने का संगीन आरोप लगा है।

क्या है पूरा मामला?

पीड़ित कमल नयन तिवारी ने आरोप लगाया है कि 29 मई 2026 को बिछियाटोला नदी के किनारे अवैध रेत उत्खनन का वीडियो बनाना उसे महंगा पड़ गया। रेत माफियाओं ने उसे बंधक बनाकर मारपीट की, घसीटा और जान से मारने की धमकी दी। हद तो तब हो गई जब केल्हारी थाने ने रिपोर्ट दर्ज करने के बजाय मामले को दबाने की कोशिश की।

पुलिस का यह कृत्य: कानूनी रूप से अक्षम्य और दंडनीय

कानूनी जानकारों के अनुसार, बिना किसी विधिवत कानूनी प्रक्रिया या जब्ती सूची (Seizure Memo) के किसी भी नागरिक का मोबाइल छीनना और उसका लॉक खुलवाकर डेटा डिलीट करना भारतीय न्याय संहिता और पुलिस अधिनियम का सीधा उल्लंघन है।

पीड़ित का आरोप है कि थाने के भीतर ही साक्ष्यों को नष्ट किया गया। यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि “साक्ष्य छिपाने” (Destruction of Evidence) का एक आपराधिक कृत्य है। आज के डिजिटल युग में, एक मोबाइल केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि व्यक्ति की पूरी डिजिटल पहचान है। उसमें मौजूद व्यक्तिगत दस्तावेज, बैंक डिटेल, गोपनीय बातचीत और फोटो पर अधिकार केवल मालिक का होता है। पुलिस का मोबाइल को अपने पास दबाए रखना न केवल निजता के अधिकार का हनन है, बल्कि यह भारतीय दंड संहिता की धारा 384 (जबरन वसूली/अवैध कब्जा) और 201 (साक्ष्य मिटाना) के दायरे में आने वाला गंभीर अपराध हो सकता है।

पीड़ित कमल नयन तिवारी ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा:

“मेरा मोबाइल छीन लिया गया है, जो अब तक मुझे वापस नहीं मिला। उसमें मेरा बैंक एटीएम, ऑनलाइन ट्रांजेक्शन और जीवन से जुड़ी तमाम महत्वपूर्ण जानकारियां हैं। मेरा सब कुछ ठप हो गया है, मेरा जो आर्थिक नुकसान हो रहा है, उसका जिम्मेदार कौन है? जिला प्रशासन या केल्हारी थाना प्रभारी?”

प्रशासन की चुप्पी, माफियाओं की मौज

बिछियाटोला में लगातार सामने आ रही गुंडागर्दी के बावजूद खनिज विभाग, जिला प्रशासन और स्थानीय थाना प्रभारी की मौन स्वीकृति कई बड़े सवाल खड़े करती है। पीड़ित ने एमसीबी पुलिस अधीक्षक से भी गुहार लगाई, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई। थक-हारकर जब वह जनदर्शन में पहुंचा, तो वहाँ भी उसे केवल कोरे आश्वासनों के सिवाय कुछ नहीं मिला। एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं।

कानून व्यवस्था पर उठते सवाल

साक्ष्य मिटाने की साजिश: पुलिस द्वारा मोबाइल से वीडियो डिलीट करना इस बात का सबूत है कि प्रशासन के भीतर बैठे कुछ लोग माफियाओं को बचा रहे हैं।

आर्थिक और मानसिक क्षति: मोबाइल में मौजूद बैंकिंग डेटा के कारण पीड़ित को जो आर्थिक नुकसान हो रहा है, क्या उसकी भरपाई पुलिस प्रशासन करेगा?

गैर-कानूनी हिरासत और जब्ती: किसी भी नागरिक का निजी मोबाइल बिना उचित कारण और कानूनी प्रक्रिया के जब्त करना पूरी तरह असंवैधानिक है। इसके लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों पर विभागीय जांच और निलंबन की तत्काल कार्यवाही होनी चाहिए।

सुरक्षा का सवाल: जब न्याय के मंदिर (थाने) में ही नागरिक असुरक्षित महसूस करने लगे, तो आम जनता किसके भरोसे रहेगी?

प्रशासन को देना होगा जवाब

क्या कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कराएंगे? जनता अब सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि दोषियों पर सख्त कार्यवाही चाहती है। पीड़ित की मांग है कि उसके मोबाइल की फॉरेंसिक जांच हो और डेटा रिकवर कराया जाए। साथ ही, साक्ष्य मिटाने वाले और मोबाइल हड़पने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ तत्काल प्रभाव से निलंबन और एफआईआर दर्ज होनी चाहिए।

इस मामले में जिला प्रशासन और पुलिस विभाग की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

 

स्थानीय पीड़ित थाना क्षेत्र बिछिया टोला

एसपी से जनदर्शन तक लगाई फरियाद 8 दिन बीतने के बाद भी अब तक नहीं मिला मोबाइल और इंसाफ कानून व्यवस्था पर आम आदमी का विश्वास न्याय मिलेगा या नहीं

 

एमसी बी.जिला कलेक्टर कार्यालय. जनदर्शन में इंसाफ की मांग

 

 

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