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MCB की खबर

देवेंद्र सिंह चंदेल भारत की आवाज

 

एमसीबी जिला की खबर

 

​प्रशासनिक लापरवाही या ‘संवेदनशील’ सवालों से डर? MCB जिले में मीडिया को दरकिनार कर महिला सुरक्षा पर खानापूर्ति

 

 

​मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (MCB) जिले में महिला सुरक्षा और उनके अधिकारों को लेकर चल रहे सरकारी दावों की पोल खुद जिला प्रशासन और जनसंपर्क विभाग की कार्यप्रणाली ने खोल दी है। एक तरफ जहाँ ‘पोश’ (POSH) एक्ट के तहत कार्यस्थलों पर आंतरिक शिकायत समिति का गठन न करने पर ₹50,000 का जुर्माना लगाने की बात की जा रही है, वहीं दूसरी ओर महिला आयोग की अध्यक्ष के सामने महिलाओं से जुड़े गंभीर मुद्दों को उठाने के लिए मीडिया का मुंह बंद करने का प्रयास किया गया।

​क्या छिपाना चाहता है प्रशासन?

​छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. किरणमयी नायक के प्रवास के दौरान प्रेस आमंत्रण का मात्र 38 मिनट पहले जारी होना, महज एक संयोग नहीं बल्कि सोची-समझी साजिश जान पड़ती है। दोपहर 2:30 बजे के कार्यक्रम के लिए 1:52 बजे सूचना भेजना यह साबित करता है कि जिला प्रशासन और पीआरओ (PRO) विभाग ऐसे गंभीर मुद्दों से बचना चाहता था, जिन पर पत्रकारों को तीखे सवाल करने थे।

​वो गंभीर मुद्दे, जो अनसुने रह गए:

​आंतरिक समिति का ‘धरातल’ पर न होना: सरकारी और निजी संस्थानों में जहाँ 10 या उससे अधिक महिलाएं काम कर रही हैं, वहाँ आंतरिक शिकायत समिति का गठन अनिवार्य है। लेकिन सच्चाई यह है कि कई विभागों में ये समितियां कागजों तक सीमित हैं। नियमों के अनुसार, समिति में बाहरी सदस्य (जो एनजीओ से जुड़ी हों और अनुभवी हों) को शामिल करना अनिवार्य है, लेकिन विभाग अपनी ही मर्जी के लोगों को बिठाकर खानापूर्ति कर रहे हैं।

​महिलाओं का शोषण: सरकारी कार्यालयों से लेकर निजी क्षेत्र तक, महिलाओं का आर्थिक और मानसिक शोषण जारी है। जब वे शिकायत करना चाहती हैं, तो उन्हें दबा दिया जाता है। इस पर प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।

​योजनाओं की गुणवत्ता पर सवाल: हाल ही में मुख्यमंत्री कन्यादान विवाह योजना में मंगलसूत्र की गुणवत्ता और अन्य कथित अनियमितताओं ने प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

​सवालिया निशान: कौन है जवाबदेह?

​मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। जब प्रशासन को पता होता है कि कोई बड़ा कार्यक्रम है, तो मीडिया समन्वय की दृष्टि से कम से कम 24 घंटे पहले सूचना देना आवश्यक होता है। आधे घंटे का समय देकर क्या प्रशासन यह जताना चाहता था कि मीडिया का उनके पास कोई महत्व नहीं है? या फिर जानबूझकर महत्वपूर्ण सवालों को मीडिया से दूर रखा गया ताकि महिला उत्पीड़न के इन संवेदनशील मामलों पर कोई जवाब न देना पड़े?

​निष्पक्षता का गला घोंटने की कोशिश

​यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक तरफ ‘विशाखा समिति’ और ‘पोश एक्ट’ के जरिए महिलाओं को सुरक्षा का आश्वासन दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ उन मंचों पर ही पारदर्शिता का अभाव है जहाँ इन सुरक्षा उपायों पर सवाल पूछे जा सकते थे। यदि प्रशासन ईमानदार है, तो उसे यह स्पष्ट करना चाहिए कि बार-बार अंतिम समय पर सूचना क्यों जारी की जाती है? क्या यह प्रशासनिक अक्षमता है या फिर जनहित के मुद्दों को ‘ठंडे बस्ते’ में डालने की एक सोची-समझी रणनीति?

​अब देखना यह है कि क्या प्रशासन अपनी इस लापरवाही के लिए कोई स्पष्टीकरण देता है, या फिर महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा से जुड़े ये गंभीर सवाल हमेशा की तरह अनसुने ही रह जाएंगे।

जिला प्रशासन के सभा कक्ष में छत्तीसगढ़ महिला राज्य आयोग में जन.सुनवाई. महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ किरणमयी. नायक के प्रवास के दौरान प्रेस आमंत्रण के मंत्र 38 मिनट पहले ही जारी किया गया महिलाओं के हिट महिला सुरक्षा महिला उत्पीड़न से जुड़ी कई महत्वपूर्ण मुद्दे मीडिया के जुड़े सवाल अधूरे रह गए

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(7000131841)

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