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तीन माह के राशन वितरण का डंका, लेकिन चना-शक्कर गायब!
देवेंद्र सिंह चंदेल भारत की आवाज
लोकेशन चिरमिरी
क्या सरकार का आदेश सिर्फ चावल बांटने का था? गरीबों के मुंह का निवाला क्यों छीना जा रहा है?
चिरमिरी/छत्तीसगढ़ | 29 मई 2026
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा अप्रैल, मई और जून 2026 का राशन एक साथ वितरित करने का आदेश पूरे प्रदेश में बड़े जोर-शोर और प्रचार-प्रसार के साथ जारी किया गया था। सोशल मीडिया, सरकारी विज्ञापनों और मंचों पर “तीन माह का राशन वितरण” का खूब डंका पीटा गया। लेकिन चिरमिरी सहित पूरे छत्तीसगढ़ में इस योजना की जमीनी हकीकत अब गंभीर सवालों के घेरे में दिखाई दे रही है।
सरकार की योजना के तहत गरीब परिवारों को तीन महीने का चावल तो थमा दिया गया, लेकिन सबसे जरूरी और महंगी खाद्य सामग्री — चना और शक्कर — कई क्षेत्रों में पूरी तरह गायब है। आम जनता अब सवाल पूछ रही है कि क्या सरकार का आदेश सिर्फ चावल वितरण करने का था? क्या चना और शक्कर वितरण का कोई स्पष्ट आदेश नहीं था?
अगर तीन माह का राशन वितरण करना था, तो फिर तीन माह का चना और शक्कर क्यों नहीं दिया गया? आखिर गरीबों के हिस्से में आने वाली सबसे जरूरी चीजों में ही हर बार कटौती क्यों होती है?
चिरमिरी के हल्दीबाड़ी वार्ड क्रमांक 12, वार्ड 15, वार्ड 11 तथा शासकीय उचित मूल्य दुकान क्रमांक 1005 और 1024 सहित कई राशन दुकानों से लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं कि अप्रैल और मई माह का चना और शक्कर अब तक राशन कार्ड धारकों को नहीं मिला है। वहीं छत्तीसगढ़ के अन्य जिलों और ग्रामीण क्षेत्रों से भी इसी प्रकार की शिकायतें सामने आने लगी हैं, जहां कार्डधारकों को सिर्फ चावल दिया जा रहा है जबकि चना और शक्कर वितरण अधूरा पड़ा हुआ है।
सबसे बड़ी बात यह है कि कई राशन दुकानों में वितरण सूची तक नहीं लगाई गई है। दुकान कब खुलेगी, कौन-सा राशन मिलेगा, किस दिन वितरण होगा — इसकी कोई स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक रूप से नहीं दी गई। कई स्थानों पर राशन कार्ड धारकों को बिना सूचना के वापस लौटाया जा रहा है।
हमारे समाचार चैनल और अखबार द्वारा अप्रैल माह में भी इस गंभीर अव्यवस्था को प्रमुखता से उठाया गया था। उस समय जिम्मेदार अधिकारियों ने दावा किया था कि अगले महीने यानी मई में चना और शक्कर का वितरण कर दिया जाएगा। लेकिन अब मई महीना समाप्त होने की कगार पर है और हालात जस के तस बने हुए हैं।
जिम्मेदार अफसरों की चुप्पी और टालमटोल
जब इस मामले में खाद्य विभाग के अधिकारियों से संपर्क किया गया तो कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। अधिकारी लगातार जवाब देने से बचते नजर आए। फूड इंस्पेक्टर ने “आकर देखने” की बात कही, लेकिन वह भी सिर्फ आश्वासन तक सीमित रह गया।
हद तो तब हो गई जब चिरमिरी के एसडीएम से इस संबंध में जवाब मांगा गया। उन्होंने कैमरे पर कुछ भी बोलने से साफ मना कर दिया और जिम्मेदारी खाद्य विभाग पर डाल दी। इससे साफ जाहिर होता है कि पूरे सिस्टम में पारदर्शिता का भारी अभाव है।
आखिर गरीबों का ही हक क्यों छीना जाता है?
आज महंगाई चरम पर है। पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। रसोई का खर्च संभालना मुश्किल हो चुका है। ऐसे समय में राशन दुकान से मिलने वाला चना और शक्कर गरीब परिवारों के लिए थोड़ी राहत का सहारा होता था। लेकिन अब उसी राहत पर भी सरकार की नजर गड़ी हुई दिखाई दे रही है।
आम जनता पूछ रही है कि आखिर हर बार गरीबों के हिस्से की खाद्य सामग्री में ही कटौती क्यों होती है? सरकार की बचत सिर्फ गरीबों के पेट पर ही क्यों निकलती है?
मंत्री-विधायक-सांसदों को मिलने वाली फ्री सुविधाएं
जहां गरीबों को राशन में कटौती झेलनी पड़ रही है, वहीं दूसरी ओर मंत्री, विधायक और सांसदों को मिलने वाली सुविधाओं पर कोई कटौती नहीं की जाती। जनता के टैक्स के पैसों से नेताओं को कई प्रकार की विशेष सुविधाएं मिलती हैं, जिनमें शामिल हैं —
सरकारी बंगले और आवास
मुफ्त या भारी छूट वाली बिजली सुविधा
मुफ्त पानी सुविधा
सरकारी वाहन और ईंधन
रेल और हवाई यात्रा में मुफ्त या विशेष सुविधा
टोल टैक्स में छूट
सुरक्षा कर्मी और स्टाफ
फोन और अन्य भत्ते
आजीवन पेंशन सुविधा
चिकित्सा सुविधाएं और विशेष उपचार
जनता अब यह सवाल पूछ रही है कि जब सरकार खर्च कम करना चाहती है तो इन फ्री सुविधाओं में कटौती क्यों नहीं की जाती? आखिर आम नागरिकों के पेट पर ही क्यों वार किया जाता है?
अगर नेताओं और मंत्रियों को मिलने वाली अत्यधिक सुविधाओं में कमी की जाए तो राज्य सरकार को करोड़ों रुपये की बचत हो सकती है। लेकिन सरकार गरीबों को मिलने वाला चना और शक्कर रोककर बचत करना ज्यादा आसान समझती दिखाई दे रही है।
राशन दुकानों पर राजनीतिक संरक्षण का आरोप
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि कई शासकीय उचित मूल्य दुकानें पक्ष और विपक्ष दोनों के राजनीतिक सहयोगियों द्वारा संचालित की जा रही हैं। आम जनता लगातार शिकायत कर रही है कि इन दुकानों में मनमानी, कटौती और पारदर्शिता की कमी है, लेकिन प्रशासनिक अधिकारी कोई ठोस कार्रवाई नहीं करते।
जनता के हक की लड़ाई जारी रहेगी
हमारे संवाददाता देवेंद्र सिंह राजपूत द्वारा इस मुद्दे को लगातार प्रमुखता से उठाया जा रहा है। मुख्यमंत्री के चिरमिरी दौरे के दौरान भी इस गंभीर समस्या को उठाया गया था, लेकिन समयाभाव के कारण स्पष्ट जवाब नहीं मिल पाया।
अब जून माह आने वाला है। जनता की नजर सरकार और प्रशासन पर टिकी हुई है। क्या गरीबों को उनका पूरा हक मिलेगा? या फिर चना और शक्कर जैसी जरूरी सामग्री हमेशा की तरह फाइलों और घोषणाओं में ही सीमित रह जाएगी?
गरीब जनता आज सिर्फ इतना जानना चाहती है कि —
“क्या सरकार की तीन माह राशन योजना गरीबों को राहत देने के लिए थी, या फिर चना-शक्कर में कटौती करने की एक सोची-समझी रणनीति?”
दैनिक आदित्य समय जनता के अधिकार और हक की लड़ाई आगे भी प्रमुखता से उठाता रहेगा।


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