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MCB की खबर

देवेंद्र सिंह चंदेल

 

भारत की आवाज

 

लोकेशन चिरमिरी हल्दीबाड़ी शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला

 

हम वह आवाज उठाते हैं जो कोई नहीं उठाता है निष्पक्ष खबर ग्राउंड रिपोर्ट देखिए भारत की आवाज के साथ हर एक खबर शहर की

 

 

 

हल्दीबाड़ी के सरकारी स्कूल की बदहाली पर बड़ा सवाल: 5 साल में 3 शिक्षा अधिकारी बदले, अधिकारी आते रहे–जाते रहे, बच्चों की समस्याएं जस की तस

चिरमिरी। शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला हल्दीबाड़ी की बदहाली अब केवल स्कूल की अव्यवस्था का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह पूरे शिक्षा तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। पिछले कई वर्षों से स्कूल में समस्याओं की लंबी फेहरिस्त बनी हुई है। स्थिति यह है कि करीब पांच वर्षों में तीन शिक्षा अधिकारियों का तबादला हो चुका है। अधिकारी आए, ड्यूटी निभाई, निरीक्षण और भ्रमण के दावे किए और फिर तबादला होकर चले गए, लेकिन स्कूल की तस्वीर आज भी लगभग वही है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब स्कूल प्रबंधन, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी और जिला शिक्षा अधिकारी लगातार लिखित एवं मौखिक रूप से समस्याओं की जानकारी देने और समाधान के लिए मांग करने की बात कहते हैं, तो आखिर समस्या वर्षों से दूर क्यों नहीं हुई? मांग और शिकायतें आखिर किस टेबल पर अटक जाती हैं? क्या प्रशासनिक लापरवाही है, विभागीय उदासीनता है या फिर जिम्मेदारी निभाने के नाम पर केवल कागजी कार्रवाई हो रही है?

ग्राउंड रिपोर्ट में खुली शिक्षा व्यवस्था की हकीकत

हमारी टीम ने ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान स्कूल पहुंचकर प्राथमिक, मिडिल और हाई स्कूल की व्यवस्थाओं का जायजा लिया। स्कूल प्राचार्य, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी और जिला शिक्षा अधिकारी से भी समस्याओं को लेकर सवाल किए गए। अधिकारियों ने अपने-अपने स्तर पर लगातार प्रयास करने, लिखित मांग भेजने, निरीक्षण करने और समस्याओं के समाधान की बात कही। जवाब अपनी जगह सही हो सकते हैं, लेकिन सवाल यह है कि यदि जिम्मेदारी निभाई जा रही है तो वर्षों बाद भी समस्याएं जस की तस क्यों हैं?

पहले भी अधिकारियों ने समस्या दूर कराने की बात कही थी। अधिकारी बदले, लेकिन स्कूल की तस्वीर नहीं बदली। आखिर जवाबदेही किसकी है?

प्राथमिक शाला में छोटे बच्चों के लिए बुनियादी सुविधाएं तक नहीं

कक्षा पहली से पांचवीं तक पढ़ने वाले छोटे बच्चों के लिए बनाए गए बाथरूम की छत तक ठीक नहीं है। बरसात के मौसम में बच्चे खुले आसमान के नीचे शौचालय का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। इस समस्या को पहले भी प्रमुखता से उठाया जा चुका है, लेकिन करीब तीन साल बाद भी समाधान नहीं हुआ।

प्राथमिक शाला में फर्श टूटे हुए हैं, कुर्सियां टूटी हुई हैं और कई जगह भवन की स्थिति चिंताजनक है। छोटे बच्चों के लिए आवश्यक बुनियादी सुविधाओं की स्थिति ही सवालों के घेरे में है।

मध्यान्ह भोजन कक्ष में पानी टपकता है, कोयले में बन रहा भोजन!

मध्यान्ह भोजन बनाने वाले कक्ष की हालत भी गंभीर है। जर्जर भवन में पानी टपकता है और ऐसी स्थिति में रसोइयों द्वारा भोजन तैयार किया जा रहा है। सबसे गंभीर सवाल यह है कि भोजन बनाने में गैस की जगह कोयले का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है। यदि गैस के लिए राशि उपलब्ध कराई जाती है तो फिर कोयले में खाना क्यों बनाया जा रहा है और गैस की राशि का उपयोग कहां हो रहा है? यह जांच का विषय है।

रसोइयों को भी पर्याप्त सुविधा नहीं मिलने की शिकायतें सामने आई हैं। ऐसे वातावरण में बच्चों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता और सुरक्षा पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

700-800 से अधिक बच्चों के लिए पानी की व्यवस्था पर सवाल

स्कूल में लगभग 700-800 या उससे अधिक छात्र-छात्राएं होने के बावजूद ग्राउंड में एक नल के सहारे पानी की व्यवस्था बताई जा रही है। बाथरूम और टॉयलेट में पानी बाल्टियों में भरकर रखा जाता है। इतनी बड़ी संख्या में बच्चों के लिए यह व्यवस्था पर्याप्त है या नहीं, इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।

कंप्यूटर शिक्षा भी बदहाल—शिक्षक सप्ताह में केवल एक-दो दिन, कंप्यूटर कक्ष पर ताला!

आज के डिजिटल युग में कंप्यूटर शिक्षा विद्यार्थियों के लिए पढ़ाई का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है, लेकिन हल्दीबाड़ी स्कूल में कंप्यूटर शिक्षा की व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान छात्रों से मिली जानकारी के अनुसार कंप्यूटर शिक्षक सप्ताह में केवल एक या दो दिन ही स्कूल आते हैं। इससे विद्यार्थियों को नियमित रूप से कंप्यूटर सीखने और प्रशिक्षण लेने का अवसर नहीं मिल पा रहा है।

छात्रों ने यह भी बताया कि स्कूल में कंप्यूटर उपलब्ध होने के बावजूद उनका नियमित उपयोग नहीं हो रहा है और कई बार कंप्यूटर कक्ष में ताला लगा रहता है। यदि कंप्यूटर शिक्षा के लिए संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं तो उनका इस्तेमाल विद्यार्थियों की शिक्षा के लिए नियमित रूप से क्यों नहीं हो रहा?

कंप्यूटर केवल कमरे में बंद रखने के लिए नहीं, बल्कि बच्चों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने और उनके भविष्य को मजबूत बनाने के लिए हैं। आज जब शिक्षा व्यवस्था डिजिटल युग की ओर बढ़ रही है, तब सरकारी स्कूल के बच्चों को कंप्यूटर प्रशिक्षण से वंचित रखना उनके भविष्य के साथ अन्याय जैसा है।

बाउंड्रीवाल गिरती रही, 21 अगस्त को फिर बड़ा हिस्सा धराशायी

स्कूल परिसर की बाउंड्रीवाल कई स्थानों पर जर्जर है। 21 अगस्त को बाउंड्रीवाल का एक बड़ा हिस्सा गिर गया। पहले भी बाउंड्रीवाल गिरने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। स्कूल में छोटे बच्चे और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं, ऐसे में जर्जर दीवारें किसी बड़े हादसे का कारण बन सकती हैं।

चौकीदार नहीं, शाम होते ही स्कूल परिसर में शराबियों का डेरा

स्कूल में दिन-रात चौकीदार की व्यवस्था नहीं है। बताया गया कि चौकीदार की नियुक्ति थी, लेकिन उसे अन्यत्र भेज दिया गया। इसका परिणाम यह है कि शाम करीब छह बजे के बाद असामाजिक तत्वों और शराबियों का जमावड़ा परिसर में होने की शिकायत है।

सुबह जब बच्चे ज्ञान के मंदिर में पहुंचते हैं तो उन्हें शराब की बोतलें और नशे से जुड़ी सामग्री दिखाई देती है। सवाल यह है कि ऐसे वातावरण का बच्चों की मानसिकता और शिक्षा पर क्या असर पड़ेगा?

स्टेडियम और पुराने पंडाल का मामला भी सवालों में

स्कूल ग्राउंड में पहले स्टेडियम और सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए पंडाल था। दुर्गा पूजा समिति की मांग के बाद नगर निगम द्वारा नए निर्माण के लिए ठेकेदार को काम दिए जाने की बात सामने आई। करीब चार महीने पहले पुराने लोहे के पंडाल को तोड़ दिया गया।

पुराने पंडाल में भारी मात्रा में लोहा था। पंडाल टूटने के बाद वह लोहा कहां गया, इसकी जानकारी को लेकर समिति, स्कूल और नगर निगम—तीनों की ओर से अलग-अलग अनभिज्ञता सामने आती है। समिति कहती है कि उसे जानकारी नहीं, स्कूल प्रबंधन कहता है कि उसे जानकारी नहीं और नगर निगम की ओर से भी स्पष्टता नहीं है।

यह पूरा मामला जांच का विषय है।

पुराना पंडाल हटने के बाद बाउंड्रीवाल भी प्रभावित हुई और अब चार महीने बीत जाने के बाद भी नया निर्माण शुरू नहीं हुआ। नगर निगम की ओर से फंड उपलब्ध नहीं होने की बात कही जा रही है। यदि फंड नहीं था तो पुराने निर्माण को हटाने की अनुमति और कार्रवाई किस आधार पर हुई? यह भी बड़ा सवाल है।

पहली से आठवीं/नौवीं तक की किताबें अब तक नहीं पहुंचीं!

छात्र-छात्राओं की पढ़ाई से जुड़ा एक और गंभीर मामला सामने आया है। कई कक्षाओं की पाठ्यपुस्तकें अब तक उपलब्ध नहीं होने की शिकायत है और करीब तीन महीने बीत चुके हैं। यह पहली बार नहीं है। पिछले वर्ष भी ऐसी समस्या सामने आई थी और इसे प्रमुखता से उठाया गया था।

यदि समय पर बच्चों को किताबें ही उपलब्ध नहीं होंगी तो पढ़ाई का स्तर कैसे सुधरेगा?

सीसीटीवी कैमरे नहीं, सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल

मिडिल और हाई स्कूल परिसर में पर्याप्त सीसीटीवी कैमरों की व्यवस्था नहीं होने की बात सामने आई है। यदि स्कूल परिसर में कोई घटना घटती है तो उसकी निगरानी और पहचान कैसे होगी? इतनी बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं वाले स्कूल में सुरक्षा के लिहाज से सीसीटीवी की व्यवस्था क्यों नहीं की गई, यह भी शिक्षा विभाग से जवाब मांगता है।

शौचालयों की हालत बदहाल

हाई स्कूल, मिडिल स्कूल और प्राथमिक शाला के शौचालयों की स्थिति भी खराब बताई जा रही है। गंदगी, पानी की समस्या, खराब दरवाजे और रखरखाव की कमी के कारण छात्र-छात्राओं को परेशानी होती है। छोटे बच्चों के लिए तो स्थिति और अधिक चिंताजनक है।

जर्जर भवन और पेड़ भी खतरे की घंटी

स्कूल परिसर में कई भवन जर्जर स्थिति में हैं और कुछ स्थानों पर पेड़ भी गिरने की कगार पर बताए जा रहे हैं। सवाल यह है कि किसी हादसे का इंतजार किया जा रहा है या विभाग पहले से सुरक्षा उपाय करेगा?

स्कूल के आसपास नशे के सामान की बिक्री पर भी सवाल

स्कूल के आसपास गुटखा, तंबाकू और अन्य नशीले पदार्थों की बिक्री की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। बच्चों के स्कूल आने-जाने वाले रास्ते के आसपास ऐसी गतिविधियां शिक्षा विभाग के साथ-साथ प्रशासन और संबंधित विभागों की निगरानी पर भी सवाल खड़े करती हैं।

शिक्षकों के आचरण पर भी सवाल

ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान यह शिकायत भी सामने आई कि कुछ शिक्षक पान और गुटखा का सेवन करते हुए पढ़ाते हैं। यदि शिक्षक ही बच्चों के सामने नशे से जुड़े उत्पादों का सेवन करेंगे तो इसका विद्यार्थियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? शिक्षा केवल किताब पढ़ाने का नाम नहीं, बल्कि बच्चों के सामने आदर्श प्रस्तुत करने की भी जिम्मेदारी है।

महिला सुरक्षा के लिए आंतरिक शिकायत समिति का गठन हुआ या नहीं?

स्कूल में बड़ी संख्या में महिला शिक्षक एवं छात्राएं हैं। कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए कानून के तहत आंतरिक शिकायत समिति की व्यवस्था का सवाल भी महत्वपूर्ण है। स्कूल में ऐसी समिति का गठन और उसका प्रभावी संचालन हो रहा है या नहीं, इसकी भी जांच आवश्यक है। यदि समिति का गठन नहीं हुआ है तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब लिया जाना चाहिए।

पहाड़े और प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर भी सवाल

पहली से पांचवीं तक के बच्चों की बुनियादी शैक्षणिक दक्षताओं को लेकर भी सवाल हैं। बच्चों को निर्धारित स्तर तक पहाड़े और अन्य मूलभूत ज्ञान आना चाहिए। यदि विद्यार्थी निर्धारित शैक्षणिक स्तर हासिल नहीं कर पा रहे हैं तो उसकी जवाबदेही शिक्षक और प्रधानाचार्य स्तर तक तय किए जाने की व्यवस्था है। ऐसे में प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता की भी गंभीर समीक्षा जरूरी है।

यह क्षेत्र का बड़ा स्कूल, फिर इतनी अनदेखी क्यों?

हल्दीबाड़ी का यह शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला क्षेत्र के महत्वपूर्ण स्कूलों में गिना जाता है। यहां से अनेक विद्यार्थी पढ़कर आगे बढ़े हैं। कई जनप्रतिनिधियों और नेताओं के भी इस क्षेत्र से जुड़ाव और यहां पढ़ने की बात सामने आती रही है। इसके बावजूद आज स्कूल मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यही है—यदि जनप्रतिनिधियों और नेताओं की सुविधाओं के लिए व्यवस्था तुरंत खड़ी हो सकती है, तो गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों के लिए स्कूल की बुनियादी सुविधाएं वर्षों तक क्यों नहीं सुधर सकतीं?

अधिकारी बदलते गए, समस्या नहीं बदली

पिछले वर्षों में तीन शिक्षा अधिकारियों का तबादला हो चुका है। हर बार नए अधिकारी आते हैं। निरीक्षण और भ्रमण होते हैं। समस्याएं बताई जाती हैं। स्कूल प्रबंधन द्वारा लिखित मांग भेजे जाने की बात कही जाती है। ब्लॉक शिक्षा अधिकारी भी लगातार पत्राचार की बात कहते हैं। जिला शिक्षा अधिकारी भी प्रयास जारी होने का दावा करते हैं।

लेकिन जब परिणाम सामने दिखाई ही नहीं दे रहा तो फिर जिम्मेदारी किसकी है?

क्या केवल पत्र लिख देना जिम्मेदारी पूरी करना है?

क्या केवल निरीक्षण कर लेना पर्याप्त है?

क्या केवल यह कह देना कि “लगातार प्रयास कर रहे हैं” बच्चों की समस्या का समाधान है?

या फिर किसी अधिकारी को यह तय करना होगा कि समस्या किस स्तर पर अटकी है और उसे समयसीमा में कैसे दूर किया जाए?

मंत्री, विधायक और सांसदों से भी सवाल—क्या कभी इस स्कूल की सुध ली जाएगी?

चिरमिरी-हल्दीबाड़ी मार्ग से रोजाना जनप्रतिनिधि, अधिकारी और आम लोग गुजरते हैं। लेकिन जिस स्कूल में सैकड़ों बच्चे पढ़ते हैं, उसकी वास्तविक स्थिति देखने के लिए जिम्मेदार लोग कब पहुंचेंगे?

जब नेताओं और जनप्रतिनिधियों के लिए सुविधाओं में कमी नहीं छोड़ी जाती, तब सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले गरीब बच्चों को बुनियादी सुविधा देने में इतनी कठिनाई क्यों?

क्या शिक्षा केवल भाषणों और योजनाओं तक सीमित है?

जवाबदेही तय करने का समय आ गया

हल्दीबाड़ी स्कूल की समस्याएं एक-दो नहीं बल्कि लंबी और गंभीर हैं—टूटी बाउंड्रीवाल, जर्जर भवन, खराब शौचालय, पानी की कमी, सीसीटीवी का अभाव, चौकीदार की कमी, स्कूल परिसर में शराबियों का जमावड़ा, मध्यान्ह भोजन कक्ष की जर्जर स्थिति, कोयले में भोजन बनाने का आरोप, समय पर किताबें नहीं मिलना, कंप्यूटर शिक्षक की कमी, कंप्यूटर कक्ष का नियमित उपयोग नहीं होना, सफाई व्यवस्था की बदहाली, नशे के सामान की बिक्री की शिकायत, महिला सुरक्षा समिति से जुड़ा सवाल और विद्यार्थियों की बुनियादी शैक्षणिक सुविधाओं की चिंता।

अब सवाल केवल यह नहीं है कि समस्या क्या है। सवाल यह है कि समस्या का जिम्मेदार कौन है और समाधान कब होगा?

यदि प्राचार्य लगातार मांग कर रहे हैं, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी लगातार पत्राचार की बात कर रहे हैं और जिला शिक्षा अधिकारी लगातार प्रयास का दावा कर रहे हैं, तो फिर वर्षों बाद भी स्कूल की तस्वीर क्यों नहीं बदली?

अधिकारी आते हैं, अधिकारी जाते हैं—लेकिन बच्चों की परेशानी वहीं खड़ी रहती है। अब कागज नहीं, जमीन पर काम चाहिए।

समस्या एक नहीं अनेक है अधिकारी आए और अधिकारी चले गए समस्या आज भी वहीहै

एमसी बी जिला शिक्षा अधिकारी श्री राम प्रकाश मिरे..DEO,,

 

इनके पहले जो थे श्री अजय मिश्रा जिला शिक्षा अधिकारी,DEO,

 

तीसरी अधिकारी के रूप में जिला शिक्षा अधिकारी श्री रविकांत यादव जी जो वर्तमान में अभी जिले के शिक्षा अधिकारी हैं और कार्य प्रभार संभाल रहे हैं,DEO,,

 

अब आप अनुमान लगा सकते हैं की लगातार तीन जिला शिक्षा अधिकारी के तबादले हुए अधिकारी आए अधिकारी अपने कार्य प्रभार संभाले जिम्मेदारी निभाई लेकिन आज 5 वर्षों से जो साल की दुर्दशा और स्थिति आपको जो तस्वीर दिख रही है वह बदली नहीं गई जैसी थी वैसी ही समस्या बनी हुई है आज भी आखिर इनकी क्या जिम्मेदारी थी और जिम्मेदारी निभाई गई होती तो आज समस्या चिरमिरी के हल्दीबाड़ी शाला में नहीं बनी रहती मूलभूत सुविधा बाथरूम शौचालय पानी चौकीदार सीसीटीवी कैमरा यह सुविधा उपलब्ध नहीं कर पा रहे हैं अधिकारी बाकी तो लंबी चौड़ी लिस्ट है साला,में समस्या की जो आप पूरी खबर में पढ़ सकते हैं और यह ग्राउंड रिपोर्ट है

वर्तमान के जिला शिक्षा अधिकारी श्री रविकांत यादव जी हमने अपने न्यूज़ पड़ताल में चिरमिरी की साला,की समस्या को लेकर जब जिला शिक्षा अधिकारी से रूबरू हुए और साला की समस्या से अवगत कराया गया समस्या गिरने बैठे तो इन्होंने कहा जल्द समस्या का समाधान किया जाएगा और हम लगातार प्रयास कर रहे हैं हमने बिल्डिंग भवन बाथरूम सीसीटीवी कैमरा और आंतरिक शिकायत समिति महिला लेगिंग का गठन भी जल्द करवाएंगे और चिरमिरी के प्राथमिक शाला की समस्या का मैं खुद निरीक्षण करूंगा और आपको भी बुलाऊंगा समस्या साल में जो बनी है उस समस्या को दूर करने का प्रयास करूंगा अधिकारी आए निरीक्षण किया चले गए इसके पहले भी जिला शिक्षा अधिकारी आए थे और उनके द्वारा भी यह कहा गया था मैं स्वयं निरीक्षण करूंगा और आप लोगों को पत्रकारों को बुलाऊंगा लेकिन अधिकारी खुद मीडिया से भागते हैं जबकि उनकी एक जिम्मेदारी मीडिया के प्रति जो प्रमुखता से मीडिया खबर उठाती है तो उस,समस्या के निरीक्षण पर अधिकारियों को मीडिया को खबर देनी चाहिए जिससे मीडिया और अधिकारी और आम जनता का विश्वास बना रहे मगर अधिकारी ऐसा नहीं करते हैं

हमने ब्लॉक शिक्षा अधिकारी से भी साला,की समस्या से अवगत कराया और समस्या की जब लंबी चौड़ी लिस्ट की गिनती कराई गई तो उनके द्वारा बताया गया कि हम लगातार प्रयास कर रहे हैं और अपने उच्च अधिकारी को लिखकर दे रहे हैं और जल्द समस्या दूर हो जाएगी यह है ब्लॉक शिक्षा अधिकारी का जवाब मतलब सभी ने अपनी जिम्मेदारी निभाई लेकिन जिम्मेदारी निभाने के साथ समस्या और तस्वीर बदली नहीं जा सकती जो आपके सामने तस्वीर बता रही है हकीकत क्या है

पहली से आठवीं तक के छात्र-छात्राओं के अब तक बुक किताबें, साला में उपलब्ध नहीं हो,पाई है 3 माह बीत चुके हैं छात्र-छात्राओं के शिक्षा में प्रभाव पड़ रहा है पढ़ाई अधूरी रह जा रही है समय आगे निकल रहा है स्कूल के प्रचार प्रधान अध्यापक कहते हैं कि हमने लगातार मांग कर रहे हैं

और यह समस्या कोई नई नहीं है इसके पहले बीते वर्ष में भी यह समस्या सामने आई थी और आज फिर वही समस्या फिर छात्रों के बुक किताबें उपलब्ध नहीं होने की फिर दोबारा सामने आई है हमने पहले भी प्रमुखता से इस खबर को उठाया था और आज फिर 1 साल बीतने के बाद मतलब आप प्रशासन कितना ध्यान दे रहा है आप सोच सकते हैं वहीं अगर नेता मंत्री जनप्रतिनिधियों की सुविधा में कोई कमी नहीं की जाती है लेकिन छात्र और प्राथमिक शाला की जो दुर्दशा स्थिति एक नहीं अनेक भवन से लेकर छात्रों के पढ़ने वाले बुक तक में समस्या आ रही है और कोई सुनने वाला नहीं है अगर इसी साला में क्या बड़े नेता मंत्री सांसद के बच्चे पढ़ते तो भी क्या ऐसा होता

नहीं उस समय समस्या ही नहीं आती जानता है पब्लिक है आम नागरिक परेशान होती है तो होने दो

यह साला के अंदर बने ग्राउंड में पंडाल, रहा करता था जिसमें साला के सांस्कृतिक कार्यक्रम 15 अगस्त और कई ऐसे कार्यक्रम किए जाते थे लेकिन या पंडाल हल्दीबाड़ी दुर्गा पूजा समिति के द्वारा इसमें सार्वजनिक पूजा भी बैठाया जाता था और जो यह वर्षों पुराना, एसईसीएल, के द्वारा दुर्गा पूजा समिति ने निर्माण कराया था जो 1000 टन लगभग लोहे से मजबूत बना हुआ था जिसमें बने भवन जर्जर हो चुके थे सुरक्षा बाल गिर रही थी पानी भी चुता था जिसको देखते हुए दुर्गा पूजा समिति ने चिरमिरी नगर निगम से निर्माण की मांग की और यह निर्माण प्रस्ताव पास हो गया इसके बाद ठेकेदार आज से 4 महीना पहले आनंन-,फानन में, निर्माण करने के उद्देश्य लोहे के बने हुए पंडाल को डिस्मेंटल कर दिया गया जिसमें 1000 टन लोहा निकाल के यहां पर रख दिया गया लावारिस जो स्कूल समिति ने मांग किया था लेकिन उनको नहीं दिया क्या और नगर निगम ने भी उस लोहा को अपने कब्जे में नहीं लिया समिति बोलती है हमको नहीं पता नगर निगम बोलते हमको नहीं पता स्कूल प्रबंधक बोलना हमको नहीं पता चलो ठीक है यह जांच का विषय है लेकिन 4 महीने बीतने के बाद में भी जब हमने ठेकेदार से पूछा तो उनके द्वारा कहा गया फंड में पैसा नहीं है अब स्थिति यह है कि यह साला के जो बाथरूम है कक्षा है गिरने के कगार में है शीशम के पेड़ लगे थे जो गिर चुका है जब निर्माण करना ही नहीं था तो चार महीना पहले इसे गिरकर छोड़ना क्यों था हमने प्रमुखता से उस समय सवाल उठाया था समाचार के माध्यम से ना इसकी खबर नगर निगम ने लिया ना समिति ने लिया ना स्कूल प्रबंधन में नतीजा आज सामने आप देख रहे हैं एक तरफ नगर निगम करोड़ के विकास कर रही है लेकिन शिक्षा ज्ञान के मंदिर में निर्माण विकास के लिए फंड और पैसा ही नहीं है यह कैसा विकास है जल्द विकास निर्माण नहीं कराया गया तो साला के जो कक्षा दिख रहे हैं वह पूरी तरह से गिर जाएंगे जिसका जिम्मेदार कौन होगा

यह साला का मध्यान भोजन बनाने का कक्षा रूम है जहां रसोईया महिला समूह के द्वारा मध्यान भोजन बनाया जाता है जो कई ऐसी चुनौतियों से लड़ रहे हैं जिनका समय पर पेमेंट नहीं होता है और इनका प्रतिदिन का₹60 के दर से लगभग पेमेंट होता है और कई कई महीने तक पेमेंट नहीं हो पता है रूम कक्षा में पानी जगह-जगह टपकता है गिरता है सीट की स्थिति आप देख रहे हैं फटी हुई है इसके पहले भी हमने प्रमुखता से खबर उठाई थी यह कोई छुपाया नहीं जा सकता और आज भी वह स्थिति बनी है सिर्फ बदल गया है तो मध्यान भोजन बनाने का रूम को पहले यह ग्राउंड के पंडाल में मध्यान भोजन बनाया जाता था जो अब प्राथमिक शाला के पीछे रूम के अंदर बनाया जाता है लेकिन वहां भी स्थिति कोई छुपी नहीं है ग्राउंड रिपोर्ट पर जब हमने जाकर देखा और पड़ताल की तो जो महिलाएं हैं एक छोटे से रूम में जहां पानी टपक रहा था जगह तक नहीं थी मध्यान भोजन बना रही थी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है हमने पहले भी प्रमुखता से उठाया था और आज भी शासकीय संस्था स्थान पर कोयला जालना प्रतिबंध है और कोयले से खाना नहीं बनना चाहिए नियमों का उल्लंघन करते हुए कोयले में खाना बनाया जा रहा है

जबकि गैस सिलेंडर में खाना बनाना चाहिए और आखिर वह गैस सिलेंडर का पैसा कहां जाता है किसके पॉकेट में जाता है कोई देखने वाला नहीं है जानकारी यह भी मिली है गैस सिलेंडर जब से आया है तब से आज तक गैस भर ही नहीं गया कोयले में सरकारी संस्था पर कोयला जालना या खाना बनाना गैर कानूनी अपराध है और इसमें अनुविभागीय अधिकारी के बड़ी कार्यवाही करने का भी प्रावधान है मगर सब कुछ भगवान भरोसे

  • प्राथमिक शाला के छात्र खुले छत के नीचे बाथरूम शौचालय जाने की मजबूरी बनी हुई है यह समस्या 5 वर्षों से है अधिकारी आए अधिकारी चले गए अधिकारियों के रूम में टाइल्स चमचमाती और ऐसी लगे रहते हैं बाथरूम चमचमाती रहते हैं तो फिर इन साला,में छात्रों,के शौचालय में बाथरूम में सीट तक नहीं जो अधिकारियों की जिम्मेदारी पर भी कई सवाल खड़े करते हैं

यह है पहली से पांचवी तक के छात्रों की साला की तस्वीर कक्षा की, जो तस्वीर आप देख रहे हैं वह नीचे फर्श की है जो जगह-जगह से फट चुके हैं टूट चुका है फिर भी छात्र इस कक्ष में पढ़ने पर मजबूर है आखिर कहे भी तो किस

 

दूसरी तस्वीर है साला की जर्जर स्थिति भवन की जो कभी भी गिर सकते हैं तीसरी तस्वीर है लगातार मूसलाधार बारिश से बाउंड्री वॉल का बड़ा हिस्सा भारी बरसात से गिर चुका है जो लगातार बाउंड्री के निर्माण की मांग की जा रही थी

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