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देवेंद्र सिंह चंदेल भारत कीआवाज

 

लोकेशन चिरमिरी खड़गवां ब्लॉक

 

₹1.20 करोड़ का रोजगार केंद्र बना खंडहर! चार साल से ताला, महंगी मशीनें कबाड़ में तब्दील होने की कगार पर

चिरमिरी-खड़गवां में रोजगार का संकट, लेकिन रोजगार देने वाली योजना पर ही सन्नाटा—पक्ष और विपक्ष दोनों से जवाब की दरकार

 

 

खड़गवां/दुबछोला।

चिरमिरी और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों की कमी के बीच सरकार द्वारा स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाई गई योजनाओं की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े हो रहे हैं। खड़गवां विकासखंड के ग्राम दुबछोला में वर्ष 2023-24 के दौरान महात्मा गांधी रीपा रूरल इंडस्ट्रियल पार्क का निर्माण करीब ₹1 करोड़ 20 लाख की लागत से कराया गया था। बड़े क्षेत्रफल में बनाए गए इस केंद्र का उद्देश्य स्थानीय ग्रामीणों, महिला समूहों और बेरोजगारों को स्थानीय स्तर पर काम और रोजगार उपलब्ध कराना था।

बताया गया कि यहां पेवर ब्लॉक, ईंट निर्माण सहित विभिन्न गतिविधियों के लिए महंगी मशीनें भी लगाई गई थीं। यानी योजना का मकसद साफ था—गांव में ही रोजगार का अवसर तैयार करना, ताकि लोगों को रोजगार की तलाश में बाहर न जाना पड़े।

लेकिन वर्तमान स्थिति इसके ठीक विपरीत दिखाई दे रही है। स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार केंद्र लंबे समय से बंद है और करीब ₹80 हजार बिजली बिल बकाया होने की बात सामने आ रही है। इसी वजह से केंद्र में ताला लगे होने की जानकारी है। हालांकि बिजली बिल, बंद होने की अवधि और अन्य वित्तीय तथ्यों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित विभाग से होना बाकी है।

चार साल से ताला, मशीनों की हालत पर सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस योजना पर करीब ₹1.20 करोड़ खर्च किए गए, वह इतने लंबे समय से बंद क्यों है? यदि बिजली बिल ही संचालन में बाधा है तो जिम्मेदार विभागों द्वारा इसका समाधान क्यों नहीं किया गया?

बंद पड़े केंद्र में लगी महंगी मशीनों की सुरक्षा और रखरखाव को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय जानकारी के अनुसार मशीनें लंबे समय से उपयोग में नहीं होने के कारण खराब हो रही हैं और कई सामान के चोरी होकर कबाड़ में तब्दील होने की आशंका भी जताई जा रही है। ऐसे में यह जांच का विषय है कि केंद्र में खरीदी गई कुल मशीनों की संख्या क्या थी, उनकी कीमत कितनी थी, वर्तमान में कितनी मशीनें मौजूद हैं और उनकी वर्तमान स्थिति क्या है।

RTI से जानकारी मांगने पर भी स्पष्टता नहीं

मामले की जानकारी हासिल करने के लिए RTI के माध्यम से रिकॉर्ड और संबंधित जानकारी मांगी गई। लेकिन उपलब्ध जवाब से संतुष्टि नहीं होने के बाद अब छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग से भी जवाब मांगा गया है।

ग्राम पंचायत के सचिव से जानकारी लेने के लिए संपर्क करने की कोशिश की गई। सचिव को फोन लगाया गया, लेकिन फोन रिसीव नहीं हुआ। जनपद पंचायत अध्यक्ष और CEO से भी मामले में जानकारी लेने का प्रयास किया गया, लेकिन स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया।

ऐसे में सवाल यह भी है कि जब सरकारी योजना जनता और ग्रामीणों के रोजगार के लिए बनाई गई थी, तो उसके बंद होने के कारणों और खर्च हुए सरकारी धन का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से सामने क्यों नहीं आ रहा?

रोजगार के लिए चिरमिरी से बाहर जा रहे लोग, फिर रोजगार केंद्र बंद क्यों?

चिरमिरी और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की कमी लंबे समय से चिंता का विषय बनी हुई है। स्थानीय स्तर पर पर्याप्त रोजगार के अवसर नहीं होने के कारण बड़ी संख्या में लोग काम की तलाश में दूसरे शहरों और राज्यों की ओर जा रहे हैं।

ऐसे समय में यदि स्थानीय रोजगार उपलब्ध कराने के लिए करोड़ों रुपये की योजनाएं बनाई जाती हैं और उनमें मशीनें लगाई जाती हैं, लेकिन कुछ समय बाद उन पर ताला लग जाता है, तो योजना की उपयोगिता और निगरानी दोनों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

पक्ष और विपक्ष दोनों से सवाल

इस मामले में राजनीतिक सवाल भी खड़ा होता है। यह योजना पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में बनी थी। अब कांग्रेस विपक्ष में है, लेकिन बंद पड़े इस रोजगार केंद्र को लेकर स्थानीय स्तर पर विपक्ष की ओर से कोई प्रभावी आवाज सामने नहीं आने का सवाल उठ रहा है।

वहीं वर्तमान में सत्ता में भाजपा सरकार है। यदि केंद्र वास्तव में केवल बिजली बिल अथवा प्रशासनिक कारणों से बंद है, तो सरकार के सामने इसे नियमों के अनुसार दोबारा शुरू कराने और स्थानीय लोगों को रोजगार देने की संभावना पर काम करने का अवसर मौजूद है।

जनता का सवाल सीधा है—सरकार कोई भी हो, योजना जनता के पैसे से बनी है तो उसकी जिम्मेदारी भी जनता के प्रति होनी चाहिए।

₹20 करोड़ की योजनाओं का भी मांगा जा रहा हिसाब

जानकारी के अनुसार पूर्व में कोरिया और वर्तमान MCB क्षेत्र के विभिन्न ग्राम पंचायतों में रीपा सहित ऐसी योजनाओं के निर्माण पर करीब ₹20 करोड़ की लागत से काम कराए जाने की बात सामने आई है। यदि यह आंकड़ा आधिकारिक रिकॉर्ड में सही है, तो यह भी जांच का विषय है कि कितने केंद्र आज संचालित हैं, कितने बंद हैं, कितनी मशीनें उपयोग में हैं और कितनी जगहों पर सरकारी निवेश निष्क्रिय पड़ा है।

सिर्फ भवन बन जाना और मशीनें खरीद लेना ही रोजगार योजना की सफलता नहीं है। असली सवाल यह है कि स्थानीय लोगों को कितने दिन रोजगार मिला, कितनी आय हुई, समूहों को कितना लाभ मिला और आज योजना किस स्थिति में है।

भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच भी जरूरी

इस पूरे मामले में स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि जांच और सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर ही हो सकती है। इसलिए निर्माण लागत, मशीनों की खरीद, भुगतान, बिजली बिल, संचालन अवधि, उत्पादन, लाभार्थी समूहों और वर्तमान परिसंपत्तियों का स्वतंत्र एवं विभागीय ऑडिट कराया जाना आवश्यक है।

यदि कहीं अनियमितता हुई है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और यदि योजना तकनीकी या प्रशासनिक कारणों से बंद है तो उसे दूर कर रोजगार की गतिविधियां शुरू करने की दिशा में कार्रवाई होनी चाहिए।

आखिर ₹1 करोड़ 20 लाख की लागत से तैयार रोजगार केंद्र पर चार साल तक ताला लटका रहना और महंगी मशीनों का निष्क्रिय पड़े रहना सिर्फ एक भवन का मामला नहीं, बल्कि स्थानीय बेरोजगारों के रोजगार के अवसर से जुड़ा सवाल है।

मीडिया का काम सवाल उठाना और जनता के मुद्दों को शासन-प्रशासन तथा जनप्रतिनिधियों तक पहुंचाना है। इस मामले में भी सवाल तब तक उठते रहेंगे, जब तक योजना की वास्तविक लागत, वर्तमान स्थिति, बंद होने का कारण, मशीनों की स्थिति और रोजगार से जुड़े पूरे रिकॉर्ड पर स्पष्ट जवाब सामने नहीं आता।

एमसीबी जिले के चिरमिरी विकासखंड ग्राम पंचायत दूधछोला,मे एक करोड़ 20 लाख की लागत से बना महात्मा गांधी रीपा इंडस्ट्रियल पार्क में 4 साल से लटका है ताला पूर्व कांग्रेस कार्यकाल के समय रोजगार के उद्देश्य निर्माण कराया गयाथा

जनप्रतिनिधि से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों की घोर लापरवाही रोजगार देने और पुणे दोबारा चालू करने की वजह 4 साल से लटका दिया गया ताला 25 से 30 लाख की पेपर ब्लॉक मशीन कबाड़ और जर्जर हो रही है ना चौकीदार हैं ना कोई देख नारेख आम नागरिक के टैक्स के पैसों कीबर्बादी

इस निर्माण का उद्देश्य था ग्रामीण स्थानीय नागरिकों को रोजगार उपलब्ध कराना जो की महिला समूह में कुछ दिन तो इसे,चलाया गया खुशबू महिला समूह सहायता में, जानकारी के अनुसार पता चला कि इसमें बिजली बिल 80000 आने की वजह से बंद कर दिया गया जबकि वर्तमान सरकार बिजली बिल माफ करने की योजना बनाई और चालू की गई है जिसमें चाहे तो इसे बिजली बिल माफ करके पुना,दोबारा चालू किया जा सकता है, और स्थानीय ग्रामीण नागरिकों को फिर से दोबारा रोजगार देकर उद्देश्य को पूरा किया जा सकता है जबकि, लगातार शहर में रोजगार नहीं होने की वजह से घटती आबादी और बाहर की ओर पलायन करता या शहर, चिरमिरी से लेकर ग्रामीण स्थानीय नागरिक तक, फिर भी जनप्रतिनिधिखामोश,, है

भवन के अंदर पेपर ब्लॉक मशीन इलेक्ट्रॉनिक खंडहर और सढ़ती नई स्थिति की खरीदी के कुछ दिन चलाया फिर रूम के अंदर लॉक करके बड़े-बड़े ताले लटक दिए गए अगर इसे चालू कर दिया जाए वर्तमान सरकार,के द्वारा तो स्थानीय नागरिकों को रोजगार और नौकरी मिलेगा, और शहर में, आवाजाही बढ़ेगी जनता का विश्वास सरकार की ओर बढ़ेगा

खड़गवां जनपद पंचायत से हमने कई बार जानने की कोशिश की गई आरटीआई भी लगाया गया किसी प्रकार का यहां से कोई जानकारी नहीं दी गई ना अध्यक्ष के द्वारा नही सीईओ सचिन के द्वारा कोई जानकारी नहीं दी गई जमकर हुई भ्रष्टाचारी रिश्वतखोरी बंदरबांट किया गया मिलकर,, आम नागरिक आम जनता के टैक्सों का पैसे से निर्माण कराया जाता है जनता के पैसे के निर्माण से

 

आज जनता को क्या मिला योजना बनी जनता के लिए कुछ दिन जमीनी स्तर पर योजना चली फिर 4 सालों से ताला लटका दिया गया

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